कभी सोचा है कि किसी छोटी-सी आदत का असर आपके जीवन पर कितना बड़ा हो सकता है? मुझे ये बात तब समझ आई, जब मेरे हाथ में एक छोटा-सा सिक्का था—पाँच का।
बात सर्दियों की ठंडी सुबह की है, जब कोहरा हर चीज़ को ढक देता था। मैं ग्यारहवीं में था और सुबह-सुबह कोचिंग के लिए साइकिल से निकलता था। कड़क ठंड में निकलने का आलस, और वापसी पर चाय की गर्माहट का आनंद—ये दोनों मेरे दिन का हिस्सा बन चुके थे।
एक सुबह, तैयार होते वक्त मेरी नजर पापा की पैंट पर पड़ी, जो कमरे के कोने में टंगी हुई थी। जाने क्यों, मैंने उनकी जेब में हाथ डाल दिया। सिक्कों की खनक सुनते ही दिल एक अजीब-सी खुशी से भर गया। जैसा अक्सर कहा जाता है, "छोटी चीज़ें भी दिल को खुश कर सकती हैं।" बस, मैंने पाँच का एक सिक्का अपनी जेब में डाल लिया। उस वक्त लगा कि ये तो बस एक छोटी-सी बात है। पर क्या सच में छोटी बातें मायने नहीं रखतीं?
पहला दिन बीता, फिर दूसरा, और देखते-देखते ये मेरा रोज़ का नियम बन गया। हर सुबह एक सिक्का। पापा की जेब में सिक्कों की खनक उतनी ही भरी रहती थी कि किसी को शक न हो। मुझे भी ऐसा लगा कि ये एक खेल सा बन गया है, जिसमें मैं जीत रहा हूँ।
लेकिन खेल ज्यादा लंबा नहीं चला। एक सुबह मैंने देखा कि जेब में गिनती के चार-पाँच सिक्के ही बचे हैं। मैंने इसे नजरअंदाज कर दिया। आखिर, मेरे एक सिक्का लेने से क्या फर्क पड़ता? पर फर्क तब दिखा, जब कुछ दिनों बाद सिर्फ दो सिक्के रह गए।
उस दिन, स्कूल से लौटने पर पापा ने मुझे बुलाया। उनके चेहरे पर गुस्से का नामोनिशान नहीं था। बस उन्होंने मुस्कुराते हुए पूछा, "बेटा, कुछ चाहिए होता है तो मुझसे मांग लिया करो। ऐसा चुपचाप लेना ठीक नहीं है।"
उनकी बात सुनकर मेरे अंदर अजीब-सी हलचल मच गई। वो मुझे डांट सकते थे, गुस्सा कर सकते थे, लेकिन उन्होंने प्यार से समझाया। उनकी यही बात मेरे दिल पर लग गई। मैंने तुरंत माफी मांगी और वादा किया कि आगे से ऐसा कभी नहीं होगा। उस दिन मैंने सीखा कि छोटी-छोटी गलतियां, जो नजरअंदाज की जाती हैं, वक्त के साथ बड़ी बन जाती हैं। और ये भी कि अपनों से कुछ मांग लेने में कोई बुराई नहीं है।
आज भी, जब कभी मैं किसी छोटी बात को टालने की सोचता हूं, तो वो सिक्के की खनक और पापा की वो बात मेरे कानों में गूंज जाती है।
हमारे जीवन में भी कई बार ऐसी छोटी-छोटी आदतें होती हैं, जिन्हें हम नजरअंदाज कर देते हैं। पर जैसा अक्सर कहा जाता है, "एक बाल्टी पानी से रोज़ एक चम्मच निकालते जाओ, तो एक दिन बाल्टी खाली हो जाती है।" क्या हमारे जीवन में भी ऐसी आदतें हैं जो हमें छोटी लगती हैं, पर समय के साथ उनका असर बड़ा हो सकता है? और अगर हैं, तो क्या हम उन्हें समय रहते सुधारने की कोशिश करेंगे या उन्हें अपनी पहचान का हिस्सा बनने देंगे?
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