बीते महीने में, अपने कॉलेज के दिनों के एक दोस्त की शादी में गया था, जहां सब दोस्तों से मिलने का मौका मिला। वहां सबने कॉलेज में बिताए लम्हों को याद किया, और उनमें से एक लम्हा मुझे याद आया। मेरा नाम रोहित है, और मेरी दोस्ती रिया से शुरू हुई थी। हम दोनों एक-दूसरे से बहुत अच्छे दोस्त बन गए थे। हमारी बातें देर रात तक होती थीं—कहीं हंसना, कहीं चुप रहना। रिया की जिंदगी में एक पुराना दर्द था, जो उसे परेशान करता था। वह अपने एक्स-रिलेशनशिप के बारे में बात करती थी, और मैं उसकी बातें ध्यान से सुनता था, उसके दर्द को समझने की कोशिश करता था। मैं केवल यही चाहता था कि उसकी मुश्किलें कम कर सकूं।
धीरे-धीरे,
रिया
अपने
दर्द
से
उभरने
लगी
थी।
एक
दिन,
उसने
मुझे
वादा
किया,
"मैं
अब
कभी
उससे
वापस
नहीं
मिलूंगी।"
यह
बात
सुनकर
मुझे
सुकून
मिला,
लगा
सब
कुछ
ठीक
है।लेकिन
एक
दिन,
मुझे
बैंक
जाना
था,
और
रिया
ने
कहा
कि
वह
भी
साथ
चलेगी।
जब
हम
बैंक
गए
और
वापस
आए,
तब
मैंने
देखा
कि
उसका
एक्स
वहां
था।
उसने
मुझे
कहा
कि
वह
उससे
मिलना
चाहती
है।
मैंने
अपने
दिल
में
महसूस
किया
कि
वह
जो
वादा
किया
था,
उसका
याद
आना
मेरे
लिए
एक
झटका
था।
लेकिन
मैंने
कुछ
नहीं
कहा,
बस
उसे
जाने
दिया।
कुछ दिन
बाद,
रिया
का
कॉल
आया।
मैंने
उससे
पूछा,
"तुमने
मुझसे
ये
क्यों
छुपाया?
तुमने
तो
कहा
था
कि
तुम
वापस
नहीं
जाओगी,
फिर
ये
सब
क्या
था?"
उस
दिन
के
बाद,
हमारे
बीच
एक
दूरी
महसूस
होने
लगी।
रिया
अब
पहले
की
तरह
बातें
नहीं
करती
थी,
और
मैं
अपने
ख्यालों
में
उलझा
रहने
लगा।
कभी-कभी
लगता
है
कि
दोस्ती
में
सब
कुछ
कह
देना
जरूरी
होता
है,
लेकिन
कुछ
बातें
कह
देने
से
दोस्ती
का
रिश्ता
बदल
जाता
है।
हम
दोनों
के
बीच
अब
वो
पहले
वाला
बंधन
नहीं
था।
शायद
हमने
एक-दूसरे
से
ज़्यादा
उम्मीद
लगा
ली
थी,
या
शायद
कुछ
वादे
ऐसे
होते
हैं
जो
टूटने
के
लिए
ही
बने
होते
हैं।
जब
मैं
यह
सब
कुछ
सोच
रहा
था,
तो
मेरे
दिमाग
में
एक
खयाल
आया,
और
मैंने
खुद
से
कहा:
जो
हुआ
था
वादा,
वो
टूट
गया,
एक
यकीन
था,
जो
खुद
से
छूट
गया।
ग़म-ए-यार
में
सब
आम
हो
गया,
जिस
पर
किया
था
यकीन,
वही
दूर
हो
गया।'
कहानी
यहीं
खत्म
होती
है—ना
कोई
इलज़ाम,
ना
कोई
जवाब।
सिर्फ
कुछ
शिकवे
जो
कहीं
अंदर
दब
गए
हैं,
और
एक
अधूरा
रिश्ता
जो
अपनी
जगह
पर
रुक
गया
है।
कभी-कभी
हम
ऐसे
मोड़
पर
आ
जाते
हैं
जहाँ
वादों
और
विश्वास
की
नींव
में
दरारें
आ
जाती
हैं।
'वादों
की
गूंज'
केवल
एक
शीर्षक
नहीं,
बल्कि
उन
सभी
एहसासों
की
आवाज़
है
जो
रिश्ते
की
बुनियाद
को
मजबूत
करते
हैं।
क्या
हम
वादों
की
गूंज
को
फिर
से
सुन
सकते
हैं,
या
वो
गूंज
अब
हमेशा
के
लिए
चुप
हो
गई
है?
यह
सवाल
हमें
सोचने
पर
मजबूर
करता
है
कि
क्या
हमारी
दोस्ती
की
कहानियाँ
वास्तव
में
कभी
खत्म
होती
हैं,
या
ये
गूंज
हमारी
ज़िन्दगी
भर
सुनाई
देती
रहेगी,
हमें
हमेशा
याद
दिलाती
रहेगी
कि
कुछ
वादे
कभी
नहीं
पूरे
होते,
और
उनकी
खामोशियाँ
हमारे
साथ
हमेशा
बनी
रहती
हैं।
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